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सिंचाई क्या है? जानें, सिंचाई के प्रकार | Irrigation Methods in hindi

अच्छी खेती के लिए अच्छी सिंचाई (irrigation) बहुत जरूरी है। अच्छी उपज पाने के लिए किसानों को अपनी जमीन की सिंचाई सही तरीके से करनी चाहिए।

Methods of irrigation in hindi: अच्छी खेती के लिए अच्छी सिंचाई (irrigation) बहुत जरूरी है। अच्छी उपज पाने के लिए किसानों को अपनी जमीन की सिंचाई सही तरीके से करनी चाहिए। जिस तरह हम इंसानों को जीने के लिए पानी(water) बहुत जरूरी है। उसी तरह पेड़ पौधों को भी जीवित रहने के लिए सिंचाई उतनी ही जरूरी होती है। आजकल किसानों द्वारा सिंचाई की कई विधियां (Methods of irrigation) अपनाई जा रही है। अलग-अलग खेती के लिए सिंचाई के अलग-अलग तरीके (different methods of irrigation) अपनाने पड़ते हैं। 

तो आइए, द रुरल इंडिया के इस लेख में सिंचाई (irrigation) और सिंचाई के विविध स्वरूपों (Various forms of irrigation) को जानते हैं।

सबसे पहले जानते हैं कि सिंचाई क्या है?

सिंचाई क्या है? (What is irrigation?)

आसान भाषा कहें तो पेड़-पौधों को उचित तरह से पानी देना ही सिंचाई है। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि खेतों को बारिश के जरिए जो पानी मिलता है उसे सिंचाई नहीं कही जाती है। इसे प्राकृतिक सिंचाई कहते हैं। अप्राकृतिक तरीके से खेतों में पानी की पूर्ति जैसे- तालाब द्वारा सिंचाई, नलकूप द्वारा सिंचाई, नहरों द्वारा सिंचाई आदि अप्राकृतिक सिंचाई में आती है। 

भारत में सिंचाई के स्रोत और हिस्सेदारी

 भारत में सिंचाई के स्रोत और हिस्सेदारी 

  • कुओं से – 16%
  • नलकूप – 46%
  • नहरें – 24%
  • टैंक – 3%
  • अन्य स्रोत (वर्षा, नदियां, पाउंड, जल निकासी, सतही जल और अन्य)  11%

सिंचाई के प्रकार (Irrigation Types)

वैसे तो सिंचाई का चलन भारत में सदियों पुराना है लेकिन जैसे-जैसे नवीन तकनीकों का शुभारंभ हुआ। सिंचाई की तकनीक भी उसी तरह से नए स्वरुप में देखने को मिल रही है। 

मुख्यतः सिंचाई की दो प्रणालियों को अपनाया जाता है।-

  • पारंपरिक विधि (traditional method)
  • आधुनिक विधि (modern method)

1. पारंपरिक सिंचाई (traditional method)

पारंपरिक सिंचाई को जैविक खेती सिंचाई के रूप में जाना जाता है। पारंपरिक सिंचाई प्रणाली उसे कहते हैं जो पुराने जमाने में की जाती थी उस समय नई तकनीक में का विकास नहीं था।

कई बार खेती के समय बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जैसे- तूफान प्रतिकूल जलवायु, सूखा आदि।

सिंचाई की ये पुरानी रणनीतियां अभी पुरानी नहीं हुई हैं। भारत के किसान इन तकनीकों का उपयोग उचित बीज अंकुरण, फसल की बेहतर उपज के लिए अभी भी करते हैं। 

पारंपरिक सिंचाई प्रणाली

पारंपरिक सिंचाई प्रणाली 4 प्रकार की होती है, जो इस प्रकार हैं।

चेक बेसिन विधि (Check Basin Method)

यह विधि पानी की पहुंच पर निर्भर करती है। इस विधि में कृषि भूमि को एक छोटे से नाले से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। जल भूमि के सबसे ऊंचे स्थान पर जमा होता है। वहीं से सिचाई शुरू होते हैं। इस प्रकार की पारंपरिक सिंचाई काफी समय से चलती आ रही है।

पट्टी सिंचाई विधि (Strip Irrigation Method)

कृषि भूमि को विभिन्न पट्टियों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक पट्टी की लंबाई आपूर्ति के क्षेत्र में भूमि के ढलान के बिंदु पर निर्भर करती है। इश्क सिंचाई विधि में मेहनत और पैसे दोनों की ही बचत होती है। 

कुंड सिंचाई विधि (Furrow Irrigation)

जब भी फसलों को उनके जड़ में पानी दिया जाता है तो इस विधि को कुंड सिंचाई विधि कहते हैं। इस विधि से सिंचाई करना बहुत उपयोगी होता है। इस प्रकार की सिंचाई से भूमि के बड़े टुकड़ों की बेहतर सिंचाई की जा सकती है।

बेसिन सिंचाई (Basin Irrigation)

इस सिंचाई विधि का का उपयोग पैदावार बढ़ाने के लिए नहीं किया जाता है। इस विधि में खेती या पेड़ों के आस-पास ही नहर खुद आ जाता है जिससे की नहर का पानी सीधे पेड़ों को मिलता रहे।

2. आधुनिक सिंचाई (Modern Irrigation)

तकनीकी के बढ़ते विकास के साथ सिंचाई विधि में बदलाव लाया गया है। अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में कृत्रिम सिंचाई के माध्यम से खेतों में जल पूर्ति करने की प्रणाली को आधुनिक सिंचाई प्रणाली के नाम से जाना जाता है। जैसे पंपों, ट्यूबों और स्प्रे के माध्यम से फसलों को पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था।

आधुनिक सिंचाई का उपयोग अक्सर उन क्षेत्रों में किया जाता है जहाँ वर्षा की समस्या होती है या जहाँ सूखा नियमित होता है। विभिन्न सिंचाई प्रणाली प्रक्रियाओं का उपयोग करके पानी पूरे खेत में समान रूप से भरा जाता है। यह जल आपूर्ति प्रक्रिया स्रोतों के माध्यम से किया जाता है। इसमें भूजल के झरने या कुएं, झीलों, नदियों या जलाशयों के सतही जल के साधन और, उपचारित अपशिष्ट जल शामिल हैं।

आधुनिक सिंचाई प्रणाली

आधुनिक सिंचाई प्रणाली भी 4 प्रकार की होती हैं, जो इस प्रकार हैं।

सतही सिंचाई विधि (Surface Irrigation)

सतही सिंचाई विधि में खेतों में नालियां बनाकर हर कोने से पानी समान रूप से खेतों में फैलाया जाता है ताकि नालियों के आसपास के पौधों में पानी जाता रहे।

छिड़काव सिंचाई विधि (Sprinkler Irrigation)

स्प्रिंकलर वाटर सिस्टम (Sprinkler Irrigation) नियमित वर्षा की तरह सिंचाई प्रणाली पानी लगाने की एक तकनीक है। पानी एक पाइप द्वारा एक नियम के रूप में लाइनों के माध्यम से परिचालित किया जाता है। इस विधि में स्प्रिंकलर के माध्यम से पानी की छोटी बूंदों को जमीन पर गिराई जाती है। 

ड्रिप (टपक) सिंचाई विधि (Drip Irrigation)

ड्रिप सिंचाई विधि में धीमी गति से पौधों की जड़ों तक एक पाइप के माध्यम से बूंद बूंद पानी पौधों के जड़ों तक जाता है। जिससे ज्यादा दिनों तक पौधों की जड़ों में नमी बनी रहती है।

उपसतह सिंचाई प्रणाली (subsurface irrigation system) 

उपसतह सिंचाई प्रणाली में नीचे से पानी लगाकर फसलों के लिए पानी दी जाती है। इस व्यवस्था में चैनल विकसित करके या भूमिगत टाइल लाइनों या पाइपलाइनों को शुरू करके मिट्टी की सतह में पानी दी जाती है। 

कृषि में सिंचाई का महत्व (importance of irrigation in agriculture)

  • खेती में अच्छी पैदावार के लिए सिंचाई का होना बहुत जरूरी है। 
  • वर्षा सिंचित क्षेत्रों की तुलना में जलयुक्त क्षेत्रों में फसल की पैदावार अधिक होती है।
  • उचित सिंचाई प्रक्रियाओं से निरंतर कृषि व्यवसाय प्राप्त हो सकता है।
  • बीजों के अंकुरण के लिए भी जमीन में नमी अति आवश्यक होता है। इसलिए बीजों के अंकुरण में भी सिंचाई का महत्वपूर्ण योगदान है।
  • अच्छी खेती के लिए मिट्टी को उपयुक्त मात्रा में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन दोनों की जरूरत होती है जो मिट्टी को जल्द से प्राप्त होता है इसके लिए उचित अंतराल पर सिंचाई का होना अति आवश्यक है।
  •  सिंचाई प्रक्रिया के माध्यम से एक वर्ष में विभिन्न रोपण की कल्पना की जा सकती है। इससे विकास और उपयोगिता में सुधार होगा। 
  • सिंचाई प्रणाली के माध्यम से अधिक उत्पादन लाने की कल्पना की जा सकती है।

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