औषधीय पौधेबागवानीस्वास्थ्य

Methi ki kheti: मेथी की खेती कैसे करें? यहां जानें

मेथी एक पत्तेदार वाली औषधीय फसल है। इसकी गिनती मसालेदार फसलों में होती है। मेथी की खेती कैसे करें? यहां जानें

methi ki kheti: मेथी एक पत्तेदार वाली औषधीय फसल है। इसकी गिनती मसालेदार फसलों में होती है। मेथी (fenugreek) का उपयोग सब्जी, अचार और लड्डू आदि बनाने में किया जाता है। भले ही इसके स्वाद में कड़वापन हो लेकिन इसके औषधीय गुणों को जानकार आप हैरान रह जाएंगे। इसका उपयोग डायबिटीज जैसे रोग को खत्म करने में किया जाता है। इसकी खुशबू काफी अच्छी होती है। यदि किसान मेथी की खेती वैज्ञानिक तकनीक से करें, तो वे मेथी की खेती (methi ki kheti) से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

तो आइए, इस लेख मेथी की खेती (methi ki kheti) को विस्तार से जानें।

सबसे पहले यहां मेथी के पौधे (fenugreek plants) के बारे में जान लेते हैं।

मेथी (fenugreek) लिग्यूमनस परिवार का पौधा है, जो 1 फुट से छोटा होता है। इसकी पत्तियां साग बनाने के काम आती हैं। इसके दाने मसाले के रूप में प्रयुक्त होते हैं। मेथी दाने में सोडियम, जिंक, फॉस्फोरस, फॉलिक एसिड, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, जैसे मिनरल्स और विटामिन ए, बी और सी भी पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर्स, प्रोटीन, स्टार्च, फॉस्फोरिक एसिड जैसे न्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं। पेट संबंधी बीमारियों में यह काफी फायदेमंद है। इसके सेवन करने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है।

उच्च रक्तचाप (हाई वीपी), डायबिटीज व अपच में इसका उपयोग बहुत ही लाभकारी है। हरी मेथी ब्लड शुगर कम करने में मदद करती है। इस प्रकार इसका सेवन कई बीमारियों में इलाज के रूप में किया जाता है। हरी मेथी हो या दाना मेथी। दोनों प्रकार से इसका सेवन शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार है।

मेथी खाने के फायदे (benefits of eating fenugreek)

मेथी खाने के फायदे

भारत में मेथी उत्पादन की स्थिति (Fenugreek production in India)

हमारे देश में पंजाब, राजस्थान, दिल्ली सहित तमाम उत्तरी भारत में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। देश में राजस्थान और गुजरात सर्वाधिक मेथी उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य हैं। 80 फीसदी से ज्यादा मेथी का उत्पादन राजस्थान में होता है। मेथी की फसल मुख्यतः रबी मौसम में की जाती है, लेकिन दक्षिण भारत में इसकी खेती बारिश के मौसम में की जाती है।

मेथी की खेती के लिए ज़रूरी जलवायु

मेथी की खेती (methi ki kheti) के लिए ठंडी जलवायु की अच्छी रहती है। इसकी फसल में पाला सहने की क्षमता अन्य फसलों की तुलना में अधिक होती है।

इसकी खेती के लिए औसत बारिश वाले इलाके सही रहते हैं अधिक बारिश वाले इलाकों में इसकी खेती नहीं की जा सकती है।

 

खेती के लिए उपयोगी मिट्टी

मेथी की खेती (methi ki kheti) सभी तरह की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन अच्छे जल निकास वाली चिकनी मिट्टी इसकी खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त रहती है। मिट्टी का पीएच मान 6-7 के बीच होना चाहिए।

 

मेथी की खेती का समय

मैदानी इलाकों में इसकी बुआई सितंबर से मार्च तक और पहाड़ी इलाकों में इसे जुलाई से लेकर अगस्त तक की जा सकती है।

यदि आप इसकी खेती भाजी (साग) के लिए कर रहे हैं तो 8-10 दिनों के अंतर में बुआई करनी चाहिए। जिससे हर समय ताजा भाजी मिलती रहे। यदि इसके बीजों के लिए इसे बोना चाहते हैं तो इसकी बुआई नवंबर के अंत तक की जा सकती है।

 

खेती की तैयारी कैसे करें

  • मेथी की बुआई से पूर्व खेत को अच्छी तरह तैयार कर ले। 
  • इसके लिए खेत की देशी हल या हैरो की सहायता से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लें। 
  • जुताई के समय 150 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालें। 
  • अगर खेत में दीमक की समस्या है, तो पाटा लगाने से पहले खेत में क्विनालफास (1.5 फीसदी) या मिथाइल पैराथियान (2 फीसदी चूर्ण) 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देना चाहिए। इसके बाद अच्छी तरह पाटा चलाए। 
  • इसकी एक एकड़ में बिजाई के लिए इसके 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। 
  • बिजाई से पहले बीजों को 8 से 12 घंटे के लिए पानी में भिगो दें। बीजों को कीट और बीमारियों से बचाने के लिए थीरम 4 ग्राम और कार्बेनडाजि़म 50 प्रतिशत डब्लयु पी 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचार करें। 
  • रासायनिक उपचार के बाद एजोसपीरीलियम 600 ग्राम + ट्राइकोडरमा विराइड 20 ग्राम प्रति एकड़ से प्रति 12 किलो बीजों का उपचार करें। 
  • अधिकतर मेथी की बुआई छिडक़वा विधि से की जाती है। बुवाई के समय पंक्ति से पंक्ति के बीच की दूरी 22.5 सेंटीमीटर रखें और बैड पर 3-4 सेंटीमीटर की गहराई पर बीज बोएं।
  • बुवाई के समय खेत में नमी होना आवश्यक है।
  • मेथी की फसल के साथ इसकी मेड़ में मूली उगाकर भी कमाई की जा सकती है।

methi ki kheti

मेथी की उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं (fenugreek varieties)

भारत में मेथी की कई किस्में (fenugreek varieties) पाई जाती हैं। कई किस्मों को कृषि अनुसंधान केंद्रों ने अधिक पैदावार के लिए विकसित भी किया है।

आइए जानते है कुछ उन्नत किस्मों के बारे में जिनको लगाकर आप ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।

 

पूसा कसूरी मेथी

यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। इस किस्म की खेती मुख्यतः हरी पत्तियों के लिए की जाती है। इसकी पत्तियां छोटी और हंसिए के आकार की होती हैं। इस में 2-3 बार कटाई की जा सकती है। इस किस्म की यह खूबी है कि इस में फूल देर से आते हैं और पीले रंग के होते हैं, जिन में खास किस्म की महक भी होती है। बोआई से लेकर बीज बनने तक यह किस्म लगभग 5 महीने लेती है। इस की औसत पैदावार 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

 

आर.एम.टी 305

आर.एम.टी 305 बौनी किस्म की मेथी है। इस किस्म की फलियां जल्दी परिपक्व हो जाती हैं। इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किस्म चूर्णिल फफूंद रोग एवं मूलगांठ सूत्रकृमि रोग नहीं लगते हैं। प्रति हेक्टेयर खेत से 20-30 क्विंटल तक पैदावार होती है।

 

पूसा अर्ली बंचिंग

मेथी की इस जल्द पकने वाली किस्म को भी आईसीएआर द्वारा विकसित किया गया है। इस के फूल गुच्छों में आते हैं। इस में 2-3 बार कटाई की जा सकती है। इस की फलियां 6-8 सेंटीमीटर लंबी होती हैं। इस किस्म का बीज 4 महीने में तैयार हो जाता है।

 

हिसार सोनाली

हरियाणा, राजस्थान एवं आसपास के क्षेत्रों में खेती करने के लिए हिसार सोनाली काफी उपयुक्त किस्म है। यह किस्म जड़ गलन रोग एवं धब्बा रोग के प्रति मध्यम सहनशील है। यह किस्म बुआई के 140 से 150 दिनों बाद परिपक्व हो जाती है। प्रति हेक्टेयर भूमि से 30-40 क्विंटल उपज होती है।

 

कश्मीरी मेथी

मेथी की कश्मीरी किस्म की ज्यादातर खूबियां पूसा अर्ली बंचिंग किस्म से मिलती जुलती हैं, लेकिन यह 15 दिन देर से पकने वाली किस्म है, जो ठंड ज्यादा बर्दाश्त कर लेती है। इस के फूल सफेद रंग के होते हैं और फलियों की लंबाई 6-8 सेंटीमीटर होती है। पहाड़ी इलाकों के लिए यह एक अच्छी किस्म है।

 

हिसार सुवर्णा

चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार द्वारा विकसित की गई यह किस्म पत्तियों और बीज दानों दोनों के लिए अच्छी होती है। इसकी औसत उपज 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। सर्कोस्पोरा पर्र्ण धब्बा रोग इस में नहीं लगता है। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के लिए यह काफी उपयुक्त किस्में है। इन किस्मों के अलावा मेथी की उन्नतशील किस्में आरएमटी 1, आरएमटी 143 और 365, हिसार माधवी, हिसार सोनाली और प्रभा भी अच्छी उपज देती हैं।

 

मेथी की खेती में सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

हर फसल की तरह मेथी के अच्छी पैदावार के लिए इसकी सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन के बारे में आइए हम कुछ बेहद आवश्यक जानकारी जाने। सबसे पहले सिंचाई की जानकारी जानते हैं।

 

सिंचाई

बीजों के जल्दी अंकुरण के लिए बिजाई से पहले सिंचाई करें। मेथी की उचित पैदावार के लिए बिजाई के 30, 75, 85, 105 दिनों के बाद तीन से चार सिंचाई करें। फली के विकास और बीज के विकास के समय पानी की कमी नहीं होने देनी चाहिए क्योंकि इससे पैदावार में भारी नुकसान होता है।

 

खाद एवं उर्वरक

  • बिजाई के समय 5 किलो नाइट्रोजन (12 किलो यूरिया), 8 किलो पौटेशियम (50 किलो सुपर फासफेट) प्रति एकड़ में डालें।
  • अच्छी वृद्धि के लिए अंकुरन के 15-20 दिनों के बाद ट्राइकोंटानोल हारमोन 20 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
  • बिजाई के 20 दिनों के बाद एनपीके (19:19: 19) 75 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी की स्प्रे भी अच्छी और तेजी से वृद्धि करने में सहायता करती है। 
  • अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए ब्रासीनोलाइड 50 मि.ली. प्रति एकड़ 150 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 40-50 दिनों के बाद स्प्रे करें।
  • इसकी दूसरी स्प्रे 10 दिनों के बाद करें। कोहरे से होने वाले हमले से बचाने के लिए थाइयूरिया 150 ग्राम प्रति एकड़ की 150 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 45 और 65 दिनों के बाद स्प्रे करें।

 

खरपतवार नियंत्रण

पहली गुड़ाई बिजाई के 25-30 दिनों के बाद और दूसरी गुड़ाई पहली गुड़ाई के 30 दिनों के बाद करें। नदीनों को रासायनिक तरीके से रोकने के लिए फलूक्लोरालिन 300 ग्राम प्रति एकड़ में डालने की सिफारिश की जाती है इसके इलावा पैंडीमैथालिन 1.3 लीटर प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 1-2 दिनों के अंदर अंदर मिट्टी में नमी बने रहने पर स्प्रे करें। जब पौधा 4 इंच ऊंचा हो जाए तो उसे बिखरने से बचाने के लिए बांध दें।

 

मेथी की खेती में लागत और कमाई

अगर एक बार कटाई के बाद बीज लिया जाए, तो औसत पैदावार करीब 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है और 4-5 कटाई की जाए तो यही पैदावार घट कर करीब 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह जाती है। 

भाजी या फिर हरी पत्तियों की पैदावार करीब 70-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलती है। बता दें कि मेथी की पत्तियों को सुखाकर भी बेचा जाता है जिसके 100 रुपए प्रति किलोग्राम तक दाम मिल जाते हैं। अगर वैज्ञानिक तरीके से मेथी की खेती की जाए, तो एक हेक्टेयर से करीब 2-5 लाख रुपए तक कमाया जा सकता है।

 

ये तो थी मेथी की खेती (methi ki kheti) की बात। लेकिन, The Rural India पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, सरकारी योजना और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं।

Related Articles

Back to top button