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मक्का की खेती की संपूर्ण जानकारी | makka ki kheti

मक्का ऐसी फसल है जो कम समय मे अधिक पैदावार देती है और आय के एक अच्छे वैकल्पिक साधन का सबसे उत्तम उदाहरण है।

makka ki kheti: सड़कों के किनारे मिलने वाले गर्मा-गरम भुट्टे (मक्के) का स्वाद तो आपने लिया ही होगा। भुट्टा हो या सरसों के साग (Sarso ki sag) के साथ मक्के की रोटी (makke ki roti) का स्वाद बड़ा लाजबाव होता है। मक्के का औद्योगिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है। बाजार में मिलने वाला पॉपकॉर्न, स्वीटकॉर्न, आदि इसके बाइप्रोडक्ट हैं। इसके अतिरिक्त मनुष्य और मवेशियों के आहार में प्रयुक्त होने वाला एक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है।

 

लेकिन क्या अपने कभी सोचा है? भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में इतनी बड़ी मात्रा में मक्के की खेती (makka ki kheti) कैसे होती होगी? क्या किसानों को इस संदर्भ में पर्याप्त कृषि ज्ञान है। 

 

भारतीय उपमहाद्वीप में मक्का(maize), गेंहू और धान के बाद तीसरी सबसे ज्यादा उगाई जानें वाली फसलों में से एक है। मक्का की खेती (makka ki kheti) हमारे देश में लगभग सभी राज्यों में होती है। 

 

मक्का ऐसी फसल है जो कम समय मे अधिक पैदावार देती है और आय के एक अच्छे वैकल्पिक साधन का सबसे उत्तम उदाहरण है। परंतु अधिकांशतः देखा गया है भारतीय किसान भाइयों में पर्याप्त कृषि ज्ञान जैसे- मक्के में भरपूर दानें कैसे हो, किस खाद का प्रयोग करें, खाद डालने का सही समय क्या हो, बुआई कैसे करें, खरपतवारों को नष्ट कैसे करें, बीज की मात्रा कितनी रखी जाए, मक्के की कौन सी वैराइटी बोई जाए आदि इत्यादि का अभाव रहता है जो कि कम पैदावार के सबसे प्रभावी कारणों में से एक है। 

 

तो आइए, द रूरल इंडिया के इस लेख में जानें- मक्के की खेती खेती कैसे करें (makka ki kheti) 

 

सबसे पहले मक्के की खेती (maize farming) के लिए आवश्यक जलवायु के बारे में जानते हैं।

 

मक्के की खेती के लिए जरूरी जलवायु

मक्का गर्म और नम जलवायु की फसल है। मक्के की खेती (makka ki kheti) के लिए ऐसी भूमि अनुकूल होती है, जहां जल निकासी की समुचित व्यवस्था हो। मक्के की फसल के  लिए 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है। भारत में इसे जायद और खरीफ में आसानी से उगाया जा सकता है। 

 

भारत में कर्नाटक और मध्य प्रदेश में मक्का का सबसे अधिक उत्पादन होता है। सम्पूर्ण भारत के मैदानी भागों से लेकर 2700 मीटर ऊँचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में भी मक्के की बोआई की जाती है। 

 

मक्के के खेती के लिए आवश्यक मिट्टी

मक्के की खेती (makka ki kheti) के लिए मुख्यतः दोमट मिट्टी या गहरी काली मिट्टी जीवांशयुक्त मिट्टी उपयोग में लाई जाती है। मिट्टी का पीएच मान भी 6 से 7.5 के मध्य होनी चाहिए।  

 

मक्के की खेती का सही समय

वैसे तो मक्का मुख्यतः खरीफ की फसल है जिसे बोने के लिए जून-जुलाई माह सर्वाधिक उपयुक्त समय है। यदि सिचाई के पर्याप्त साधन मौजूद हो तो ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती (makka ki kheti) भी आसानी से की जा सकती है। 

 

1 – खरीफ की फसल के रूप में – जून से जुलाई माह तक

2 – रबी की फसल के रूप में – अक्टूबर से नवंबर माह तक

3 – जायद की फसल के रूप में – फरवरी से मार्च माह तक

 

ऐसे करें खेत की तैयारी

  • मक्के की खेत तैयारी करने के लिए खेत में पहली बार पानी छोड़ने के बाद हैरो से जुताई करके पाटा चला देना चाहिए। 
  • अगर गोबर की खाद प्रयुक्त करनी हो तो सुनिश्चित कर लें कि खाद पूरी तरह से सड़ी हुई हो
  • तत्पश्चात अंतिम जुताई के पहले उसे जमीन में मिला दें।
  • भूमि परीक्षण कर यदि भूमि में जिंक की कमी पाई जाती है तो इसका असर पैदावार पर पड़ता है इसलिए वर्षा से पूर्व भूमि में 25 किग्रा जिंक सल्फेट मिला देनी चाहिए। 

मक्के की उन्नत किस्में 

भारतीय उपमहाद्वीप में मक्के की अनेक किस्में उगाई जाती है जिन्हें पकने की अवधि के अनुसार अलग-अलग समूहों में बांटा जा सकता है। 

 

अति शीघ्र पकने वाली किस्में– ऐसी किस्में अति शीघ्र लगभग 75 दिन के भीतर पक कर तैयार हो जाती है।

जैसे- प्रताप हाइब्रिड मक्का- 1, विवेक – 4, विवेक- 17, विवेक- 42, विवेक- 43

 

शीघ्र पकने वाली किस्में– ऐसी किस्म शीघ्र ही लगभग 85 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। 

जैसे- प्रो-368, प्रकाश पी एच एम – 5, जवाहर मक्का – 12, अमर, आज़ाद कमल, पंत संकुल मक्का – 3, विकास मक्का – 321, हिम – 129, डीएचएम – 107, डीएचएम – 109, पूसा अर्ली हाइब्रिड मक्का- 1, पूसा अर्ली हाइब्रिड मक्का – 2, चंद्रमणि, प्रताप – 3, एक्स – 3342, डीके सी – 7084, जेकीचेम – 175

 

माध्यम समय मे पकने वाली किस्में– ऐसी किस्मे पकने में औसत समय लेती हैं जिसमे लगभग 95 दिन का समय लगता है। 

जैसे- एच एम – 4, एच एम 10, जवाहर मक्का – 216, प्रताप – 5, पी – 3441, एनएमएच – 803, बिस्को -2418, एन के 321.

 

देरी से पकने वाली किस्म– ऐसी किस्में पकने में पर्याप्त समय लेती है इन किस्मो में मक्के की पकने की अवधि 95 दिन से अधिक की होती है। 

जैसे – गंगा – 11, सीड टैंक – 2324, डेक्कन – 103, डेक्कन -105, डेक्कन – 111, डेक्कन – 101, बायो – 9681, बिस्को – 855, एसएमएच- 3904, एनके -6240

 

सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन

मक्के की फसल को बोने से लेकर पकने तक पूरी अवधि के दौरान 400 से 600 मिमी पानी की आवश्यकता होती है। इस बात का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है कि पानी देने की महत्वपूर्ण अवस्था फूलों के आने और दानों के भरने के समय होती है। साथ ही बुआई से 20 से 30 दिनों के भीतर खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई आवश्यक है। 

 

भूमि में डालने वाले खाद एवं उर्वरक की सही विधि अपनाने से मक्के की पैदावार अच्छी होती है। 

जैसे-

भूमि में पड़ने वाले नाइट्रोजन की सम्पूर्ण मात्रा का पहला भाग बुआई के समय, दूसरा भाग ड्रेसिंग के रूप में बुआई के 1 माह के उपरांत तथा अंतिम भाग नरपुष्पों के आने से पूर्व जबकि अन्य महत्वपूर्ण तत्व जैसे पोटैशियम और फॉस्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा बुआई के समय ही मिट्टी में मिला देनी चाहिए जिससे कि ये मक्के की जड़ों में जाकर उनकी वृद्धि में सहायता करें। 

 

मक्के की खेती में लागत और कमाई

वैसे देखा जाए तो मक्के की खेती (makka ki kheti) में कृषि लागत कम से कम 15 से 20 हजार रुपये प्रति एकड़ तक की आती है। मक्के में लगने वाले रोग, सिचाई, उर्वरकों के उपयोग और सही किस्मों के चुनाव पर ही लागत और कमाई निर्भर करती है।

 

अब जहां तक मुनाफे की बात है इसकी अधिकतम उपज के अनुसार प्रति एकड़ 90 हजार से एक लाख तक हो सकती है। इसके साथ ही मक्का एक अंतरवर्ती फसल है। इसके साथ अन्य फसलें जैसे- उड़द, मूंग, सोयाबीन, बरबाटी इत्यादि की बुआई कर भी दोहरा मुनाफा कमाया जा सकता है। 

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