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किसान पर निबंध | Kisan Par Nibandh

भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 14% योगदान कृषि का है, जबकि 55% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है।

संपादकीय : हक किसानों का भी है...
Kisan Par Nibandh: भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 14% योगदान कृषि का है, जबकि 55% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। किसान सदैव से देश का पेट भरता रहा है, लेकिन आज आज़ादी के 70 साल बाद भी किसान अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है। कई सरकारें आई और गई लेकिन किसानों की स्थिति जस की तस पड़ी रही।

 

1971 में भूमि सुधार पूरी तरफ से असफल रहा, तो वहीं 1991 में उदारवादी अर्थव्यवस्था में कृषि को बाजार के हवाले कर दिया गया जिससे किसानों की स्थिति और बदतर हो गई।
बहरहाल आपको बता दें, साल 1970 से 2015 के बीच यानी 47 सालों में सरकारी मुलाजिमों की इनकम 250 से 300 गुना बढ़ी है लेकिन किसानों की मात्र 20 गुना इनकम बढ़ी है।
 
सरकारी मुलाजिमों की आय इन्हीं किसानों के शोषण से बढ़ी है अर्थात किसानों का हक मारा गया है। पूरी दुनिया को झकझोर देने वाले कोरोना वैश्विक महामारी ने पूरे देश के बुनियादी संरचनात्मक व्यवस्था की ही पोल खोल दी है। कैसे प्रवासी मजदूरों को अपने ही देश में भूखों मरना पड़ रहा है? ये वही प्रवासी मजदूर हैं जो कभी खेतिहर कभी किसान हुआ करते थे। लेकिन किसानों की स्थिति पूंजीवादी व्यवस्था के मकड़जाल में फंस गई जिससे मजबूर होकर खेतिहर मजदूरों को इंडस्ट्रियल एरिया में कमाई के लिए जाना पड़ा।
संपादकीय : हक किसानों का भी है...

कोरोना महामारी ने लोकतांत्रिक भारत की असली चेहरे को पूरे देश के सामने दिखा दिया, ऐसी स्थिति की कल्पना लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं की जा सकती जहां प्रत्येक नागरिक को संविधान बराबर का हक देता हो। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दास-प्रथा फिर से आ गई हो या पहले से रही है केवल खत्म होने का एक भ्रम था।
 
किसान पूरे दिन और रात काम करता है बीज बोता है और रात में फसलों पर नजर भी रखता है मवेशियों से बचाता है और खुद को जहरीले जानवर से। ऐसे में किसान का कम पढ़ा-लिखा होनेे के कारण सरकारें लगातार शोषण करती आ रही हैं। जो उनके साथ अन्याय है।
 
एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 1951-52 में कुल उत्पादन मात्र 50 मिलियन टन था वहीं अब 250 मिलियन टन हो गया है। किसान दिन-रात मेहनत करके देश का खाद्यान्न भंडार भर रहे हैं और निर्यात भी हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद इनकी बेहतरी के लिए कोई कार्य नहीं किया गया।
 
एक उदाहरण के माध्यम से हम आपको समझाना चाहते हैं कि कैसे किसानों का शोषण हो रहा है?
 
दरअसल, साल 1970 में गेहूं का दाम 76 रूपए प्रति कुंतल था जो 2015 यानि 45 साल बाद बढ़कर 1450 रुपए हो गया, जोकि 19 गुना वृद्धि को दिखाता है।अब उसी दौरान बाकी सेक्टर के सोसाइटी का हाल जैसे सरकारी मुलाजिम, स्कूल टीचर, पुलिस, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारी, यूनिवर्सिटी प्रोफेसर की सैलरी 250 से 300 गुना बढ़ गई जबकि किसानों की आय मात्र 20 गुना ही बढ़ी है।
 
अगर इन सरकारी मुलाजिमों की भी आय 19 गुना बड़ी होती तो आज ये नौकरी छोड़ देते।
 
समस्या यह है कि किसान का हक क्या बनता है। अगर 45 साल बाद उसको 1450 रुपए मिलते हैं जोकि मात्र 19 गुना है। अगर हम 100 गुना भी इनकम बाकी अन्य सेक्टरों की तुलना में किसान को देते हैं तो उसका न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹7600 प्रति कुंतल बनता है यह उसका हक है।
 
अर्थात किसान का हक बनता था 7,600 रुपए लेकिन उसको मिला सिर्फ 1450 रुपए। फिर कहा जाता है साहब यह पैसा कहां से आएगा कभी आपने पूछा कारपोरेट को जब पैसा दिया जाता है कहां से यह पैसा आता है। कभी आपने पूछा सातवें वेतन आयोग का पैसा कहां से आएगा।
 
एक रिपोर्ट के मुताबिक 4 लाख करोड़ रुपए एडिशनल देना पड़ेगा सातवें वेतन आयोग लागू होने के बाद। वहीं जब किसान को दो लाख करोड़ देने की बात कही जाती है तो पूरे देश में हाहाकार मत जाता है, अरे! यह पैसा व्यर्थ जा रहा है, ये लोग डिजर्व नहीं करते। यह सारा कुछ हो गया तो फिजिकल डिफसिट बढ़ जाएगा। लेकिन किसी ने पूछा कि सरकारी मुलाजिम 300 गुना वृद्धि करते है तब फिजिकल डिफसिट नहीं बढ़ेगा क्या?
 
यह सारा इकोनॉमी नीतियों का खेल है, हम किसानों को जानने की जरूरत है यह कैसे बनाया गया है कि किसान को गरीब का गरीब रखें और यह पॉलिसी दशकों से चली आ रही है इसमें सभी सरकारें सम्मिलित है।
 
क्या किसी न कभी पूछा? किसान को कभी हाउस रेंट, हेल्थ एनाउंस, अदर फैसेलिटीज मिली हो, क्या किसान इस सोसाइटी में नहीं रहते?
 
सुप्रीम कोर्ट के जो ऑफिसर हैं उनको ₹21000 मिलता है कपड़ा धोने का हर साल का। डिफेंस वालों को 20000 मिलता है कपड़े धोने के लिए।आजकल आपस में लड़ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट वालों को ज्यादा क्यों मिलता हम तो बॉर्डर पर रहते हैं।
 
सवाल यह है कि क्या किसान के पास कपड़े धोने को नहीं होते, कभी सुना है आप ने किसान को कभी कपड़े धोने का मूल्य समर्थन मूल्य में जोड़ा गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में क्या करते हैं जो उसकी लागत लगती है और परिवार की मेहनत जो होता है उसको जोड़कर बस यही, और अभी तो सरकारी मुलाजिमों के लिए 108 प्रकार के एलाउंस भी है। जिसको इतना भत्ता मिलता हो उसको सैलरी की क्या जरूरत है, बात दीजिए? किसानों ने क्या जुर्म किया है कि उनको यह सुविधा नहीं मिलती है।
 
क्या कभी किसान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में हाउस रेंट जोड़ा गया कभी मेडिकल अलाउंस जोड़ा गया, क्यों क्या उसको बच्चे नहीं पालने हैं। हम यह क्यों मानकर चलते हैं कि किसान हमारे ऊपर बोझ है, हम इसके ऊपर दान कर रहे हैं। आप दान नहीं करते हैं आप उसका शोषण कर रहे हैं। आप किसान को निचोड़ रहे हैं और उसी से आप की अर्थव्यवस्था चलती है।
 
फिलहाल इस कोरोना नामक महामारी ने सबको सोचने पर विवश कर दिया कि हमको अब कोई ऐसी सामाजिक, राजनैतिक अवधारणा और सिस्टम की जरूरत है जो मानव मूल्यों की रक्षा कर सके।
 
ये तो थी, किसान पर निबंध (Kisan Par Nibandh)। ऐसे ही खेती-किसानी और ग्रामीण भारत की ब्लॉग पढ़ने के लिए द रूरल इंडिया वेबसाइट पर आएं। 

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