जीवन परिचय

जमदग्नि ऋषि का जीवन परिचय | Jamadagni Rishi Biography in hindi

जमदग्नि ऋषि एक महान ऋषि थे, जो भृगुवंशी ऋचीक के पुत्र थे। इनकी गणना सप्तऋषियों में होती है। पुराणों के अनुसार जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका थी।

जमदग्नि ऋषि का जीवन परिचय | Jamadagni Rishi Biography in hindi

jamadagni rishi ka jivan parichay: जमदग्नि ऋषि एक महान ऋषि थे, जो भृगुवंशी ऋचीक के पुत्र थे तथा जिनकी गणना सप्तऋषियों में होती है। पुराणों के अनुसार जमदग्नि ऋषि (Jamadagni Rishi) की पत्नी रेणुका थी। इनका आश्रम सरस्वती नदी के तट पर था। वैशाख शुक्ल की तृतीया को इनके पांचवें प्रसिद्ध पुत्र प्रदोषकाल में जन्मे थे जिन्हें परशुराम के नाम से जाना जाता है।

जमदग्नि ऋषि के पुत्र

सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि और उसकी माता के गर्भ से विश्वामित्र का जन्म हुआ इसीलिये जमदग्नि में भी बहुत से क्षत्रियोचित गुण थे। जमदग्नि ने राजा प्रसेनजित की कन्या रेणुका से विवाह किया था और उसके गर्भ से उन्हें रुमण्वान, सुषेण, वह, विश्वाबहु और परशुराम नाम के 5 पुत्र हुए थे।

जमदग्नि ऋषि का आश्रम

हरियाणा में कैथल से उत्तरपूर्व की ओर 28 किलोमीटर की दूरी पर जाजनापुर गाँव स्थित है। यहां महर्षि जमदग्नि का आश्रम था। अब यहां एक सरोवर अवशेष रूप में हैं। यहां प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की दसवीं को मेला लगता है। महर्षि जमदग्नि की परम्परा में बाबा साधु राम ने जहां तपस्या की है और अपने शरीर का त्याग किया है। उस स्थान को बाबा साधु राम की समाधि के रूप में पूजा जाता है। इस सरोवर की आज भी विशेष बात यह मानी जाती है कि इसमें पानी भरने के बाद फूंकार-हंकार की आवाज आती है। पूर्ण लबालब भरा सरोवर भी 15 दिनों में सुख जाता है। सांपों की इस जगह अधिकता माना जाती है। लेकिन आज तक कोई नुकसान नहीं हुआ।

उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले की सदर तहसील क्षेत्र में महर्षि जमदग्नि ऋषि का आश्रम आज आस्था का केन्द्र बना हुआ है। पुराणों में भगवान परशुराम की जन्मस्थली शाहजहांपुर जिले में दर्शाई गई है मगर उनकी कर्मभूमि एवं तपोस्थली के तौर पर जौनपुर में सदर तहसील में आदि गंगा गोमती के पावन तट स्थित जमैथा गांव रहा है।

माता रेणुका का वध

अरूणाचल प्रदेश में लोहित नदी के तट पर ही परशुराम कुण्ड स्थित है। पौराणिक मान्यता अनुसार परशुराम अपनी माता रेणुका की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए यहां आए थे। इस कुण्ड में स्नान के बाद वे मां की हत्या के पाप से मुक्त हुए थे। इस संदर्भ में पौराणिक आख्यान है कि किसी कारण वश परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि अपनी धर्मपत्नी रेणुका पर कुपित हो गए। उन्होंने तत्काल अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दे दिया। लेकिन उनके आदेश का पालन करने के लिए कोई पुत्र तैयार नहीं हुआ। परशुराम पितृभक्त थे, जब पिता ने उनसे कहा तो उन्होंने अपने फरसे से मां का सर धड़ से अलग कर दिया। इस आज्ञाकारिता से प्रसन्न पिता ने जब वर मांगने को कहा तो परशुराम ने माता को जीवित करने का निवेदन किया। इस पर जमदग्नि ऋषि ने अपने तपोबल से रेणुका को पुन: जीवित कर दिया।

रेणुका तो जीवित हो गईं लेकिन परशुराम मां की हत्या के प्रयास के कारण आत्मग्लानि से भर उठे। यद्यपि मां जीवित हो उठीं थीं लेकिन मां पर परशु प्रहार करने के अपराधबोध से वे इतने ग्रस्त हो गए कि उन्होंने पिता से अपने पाप के प्रायश्चित का उपाय भी पूछा। पौराणिक प्रसंगों के अनुसार ऋषि जमदग्नि ने तब अपने पुत्र परशुराम को जिन जिन स्थानों पर जाकर पापविमोचन तप करने का निर्देश दिया उन स्थानों में परशुराम कुण्ड सर्वप्रमुख है।

जमदग्नि और कार्तवीर्य अर्जुन

हैहयवंश का राजा कार्तवीर्य अर्जुन बहुत ही अत्याचारी राजा था। एक बार वह जमदग्नि ऋषि के आश्रम में जाता है। जहां पर वह कामधेनु गाय की विशेषता को देखकर उसे अपने साथ ले जाने का प्रयास करता है परंतु जमदग्नि कार्त्तवीर्य अर्जुन को कामधेनु गौ देने से मना कर देते हैं। इस पर वह राजा जमदग्नि ऋषि का वध कर देता है तथा कामधेनु गाय को अपने साथ ले जाता है।

अपने पिता की हत्या का बदला परशुराम कार्तवीर्य को मारकर लेते हैं और कामधेनु वापिस आश्रम में ले आते हैं। अपने पिता का अन्त्येष्टि संस्कार सम्पन्न करने के उपरांत वह प्रण लेते हें कि पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर देंगे ओर इसके लिए वह समस्त पृथ्वी पर घूम-घूमकर इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करते हैं।

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